उस बुझते हुए तारे को

आपको इस तारे से कोई सरोकार नही होगा, क्योंकि आप की आँखे चाँद की दूधिया रोशनी में ही चुँधिया जाती है। आप यहीं पर पढ़ना बंद कर सकते हैं।

Ayush Kovid जल्दी में ही अपनी लाल जैकेट ओढ़कर निकल रहा था। कोई अजीब बात नही है मेरे लिए, मगर उसने आज चाँद की एक विशेष स्थिति के बारे में इंगित किया। आज चाँद धरती से क़रीब है और सूरज की रोशनी उसे पूरा रंगमय कर देगी। पूरा चाँद खिल उठेगा। भैया, मून-वॉक का आज मज़ा ग़ालिब की मोहब्बत का शब्दों में उतरना हैं।

एक पल के लिए मै सहम सा गया। वो तारा मुझसे मिलने १:३० पर आता था। नाज़ुक सा था, रोशनी भी सही से नही पनपी थी। मगर ज़िद्दी था, हर रोज़ उसी समय बर्गद के पेड़ को चीर कर निकल आता था। धूम्रदण्डिका का धुआँ और उस तारे के पैर एक साथ चलते थे। आज चाँद अपनी अना के ग़ुरूर में ज़रूर होगा, और मेरा तारा जिसे मैं “कु” कहता हूँ, बिना “कू” किए ही चला जाएगा। कु और मेरा सम्बंध ऐसा है जो हर रोज़ मिलते है और ख़ूब बातें करते है, वो भी शब्द-विहीन। मेरा सहमना जायज़ था।

ऐसे ही चार्वाक, बुद्धा, पेरियार, diotima, अंबडेकर और ना जाने कितने तारे हुए जो किसी ना किसी परिस्थिति वश कु की तरह ग़ायब से हो गए। कुछ तारे जो हर रोज़ चमके, ख़ुद के दम से, ग्रह-त्याग किया और उस छोटी सी रोशनी के लिए झगड़े जो सबसे कम है किसी एक तारे के अस्तित्व के लिए। मगर अना से लिप्त चाँद और परिस्थिति को वो भी मंज़ूर नही। सारे के सारे तारे “कु” की तरह कुछ समय के लिए खो गए। मैं फिर से सहम गया।

आसमान सब का हैं, चाँद की बपौती नही। मैं उन तमाम तारों के लिए सोचता हूँ जो छोटी छोटी रोशनी के लिए ही आजीवन लड़ते हैं। आज की रात कुछ ख़ास है, और मैं सोच रहा हूँ, वो किसान कहाँ हैं जो छोटी सी रोशनी के लिए कड़ी धूप में पिघल रहा है। वो इंसान जो पूरे आसमान की गंदिगी को साफ़ करने के लिए ८ इंच के त्रिज्या वाले गड्ढे में घुसकर अपनी रोशनी खो देता है। वो मज़दूर जिससे आसमान रंगीन हैं, एक छोटी सी रोशनी के लिए दिन रात में फ़र्क़ भूल गया हैं। वो अम्मा जो किसी कोने में रोशनी (स्वेटर) बुन रही है, आँखों को खोने के बाद। और ना जाने कितने इंसानी तारे है जो आज बुझ गए हैं। क्यों? क्योंकि किसी एक चाँद (हाँ सिर्फ़ एक चाँद) असमय बहुत चमक गया हैं, या पूरी कायनात उसे चमकाने में लगी हैं। एक चाँद के लिए आसमान के असंख्य तारे आज बेघर हो गए हैं। और, मैं फिर से सहम गया हूँ।

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ज़िंदगी के बज़्म में, एक तू ही अग्यार <3

मंटो शब्दों के पीछे ऐसे भागते है जैसे एक नन्हा बच्चा रंगीन तितलियों के पीछे। दुख़द, बिरले ही पकड़ पाता है। शायद यहीं कारण है कि उसके शब्द रूखे, निर्वस्त्र और चोट पहचाने वाले होते हैं। दिमाग़ी धोड़ों को अगर क़ैद किए हो तो उसके एक-एक शब्द चाबुक की तरह लगेंगे। ख़ैर, आप छोड़िए आप को आदत है निर्लज्जता की। शब्द और उसमें निहित अर्थ से कहीं दूर आपने श्रुति को प्रमाण बना लिया है और उसी में मदमस्त है। तो, मंटो की कौन सुनेगा?
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कहीं पर मधुर आवाज़ में “मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा” बज रहा है। एक तरफ़ १० वॉट का बल्ब पिली रोशनी बिखेर ख़ुद चाँद बन गया है। कुछ बिखरे पन्ने, एक किताब, एक फ़ाउंटन पेन और सार्वजनिक डायरी एक मेज़ पर चेस की गोटियों की तरह सजी थी। उस्ताद ने दस्तक तक नही दी थी, या यूँ कहे दे नही पाए। कौन सा जोंक ज़ेहन को कचोट के बैठा है।
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समय चले ना चले उसमें बैठने को हज़ार घटनाए तैयार होती हैं। कुछ बस कुछ समय के लिए, और कुछ हर एक समय का हिस्सा बन जाती है। वो इसी तरह कभी मेरे आँगन में अचानक से आयी। हाँ मंटो की वही तितली। शब्दों की बुनावट से स्मृति का सफ़र, ज़िंदगी की नोकटोक से मय की दुनिया, दोस्त से अम्मा तक की यात्रा और तुम से तुम तक का सफ़र। सब ऐसे जैसे आज की गीली ज़मीन बस कल की बारिश का ही नतीजा हो।
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एक तुमने तब शिरकत की थी और एक आज। मायने अलग है दोनो के और किसी एक को चुनाव तार्किक आधार पर नही हो सकता। अगर होता तो शायद निबंधो की क़तार लगी होती। “शिरकत” होने के ख़ुद मायने नही, हर बार हम अपने वजूद को कुछ नए अर्थों से जोड़ते रहते है। Schopenhauer, Camus और काफ़्का सब अस्तित्व को ही दोष दे गए। हाँ ख़ुद के अर्थ खोजने का दरवाज़ा खुला था, और उनके फ़लसफ़ा में शायद सिर्फ़ यहीं एक दरवाज़ा। तो अब दरवाज़ा खुला है, तो इंतज़ार कैसा। (यौमे पैदाइश पर एक नया दरवाज़ा खोलिए)
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किस हिमाक़त के एवज़ किस जुर्म की पादाश में
वक़्त ने खींचा है मुझ को ज़िंदगी की दार पर
– तख़्त सिंह

उसकी स्मृति में

इस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह
कहीं न कहीं मैं रह रहा हूं जाने कितने दिनों से
जो मुझे नहीं जानता
जिसे मैं नहीं जानता
पता नहीं मैं कहां कहां रह रहा हूं
मै एक अनुपस्थित उपस्थित ।


आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है

– मुनीर नियाज़ी


सियाह रात जब श्यामल रंग में चूर हो और महताब अपनी खुदी के वजूद पर शक कर घर की दहलीज़ भी ना पार कर पाए, ऐसे आसमान में महताब की याद तारों की तरह चमकती हैं एक लम्बी सियह रात के कटने तक।


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बटोरता फिरता है वो नादानियां इस जहां में,
जमाने में गोया वही एक नादान है।
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Perplexed

He was determined to gaze at the virgin ray of sun but couldn’t have courage to get off his bed to experience the painful glimpse of it. Werther showed interest to walk at late night under the silvery umbrella of moonlight with his beloved one, but couldn’t have audacity to ask.
Was it Werther’s fate that haunted him or was his own oppressed heart that awakes him at each night to die in the morning of denial?
(From the diary of a Madman)

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एक मूर्ख की डायरी से

पाश की माने तो सपनो के मर जाने से इंसान मर जाता है। शायद गोइथे का वर्थेर के सपने मर गए होंगे इसीलिए उसने अपनी प्रेमिका के हाथ से छुहे पिस्तौल से अपने कपाल में गोली मरने में एक बार भी नही सोचा। या schopenhauer के अस्तित्व की निरर्थकता के तर्क उसके कान में बेगम अख़्तर की आवाज़ में गूँज रहे होंगे। सायद कामू भी कभी कभी ज़ेहन में आया होगा। “शायद”!
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उसका सम्बंध समय की ललाट पर पड़ी सिकुड़न से ज़्यादा रूह में पड़ी दरारों से ज़्यादा था। रात्रि के दूसरे पहर में दो उँगलियों में फँसी धूम्र-दंडिका में वो अपने मरे हुए सपनो को नही ताकता था। बल्कि, उसके सपने ना देख पाने की मरी हुई क़ाबलियत पर उबाई लेते हुए आसमान को कई पहरों तक ताकता रहता था। सपने मर जाने के बाद नए देखे जा सकते हैं, मगर क़ाबलियत ही ना रहे तो?
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वर्थेर के सिर्फ़ सपने नही मरे थे। उसके लिए पहाड़ों की फ़िज़ाओं तक ने अपना अर्थ बदल लिया था। अस्तित्व तक का कपड़ा उतर के पूरी तरह नंगा खड़ा था। शब्दों के अर्थ कामू के व्रहत indifference की तरह थे। “होना” “ना होना” सब एक समान। पिस्तोल की एक गोली ने उसके “ना होने” को “होने” में बदल दिया।

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Adieu 2018

Intentionally I picked adieu instead of ‘farewell’, ‘cheerio’, ‘bye’ and ‘wiedersehen with auf as a prefix’. Pushing my, what people call, spirit in the optimistic zone metaphorically represented as rising sun, the basic understanding behind this is to imagine something new ready for a beginning, a new prodigious inception. Therefore, I choose a word that starts from the first word of English alphabets, that is, A. I purposely left ‘adios’, ‘arrivederci’, and ‘au revoir’ despite being started with A simply because alphabetically adieu comes prior to all the other words. Enough for the justification to the title.

If the basic comprehension of ‘new beginning’ is correct, the underlying fact is one loses many things (that includes moments, places, dreams, achievements and of course persons). Therefore, losing is the main thing here, and with our conception of time, losing a year is a common phrase. Let us be a more academic and focus on the things that we lost and not concentrate on the time where, according to St. Augustine, ‘events take place’.

Ahh! Things, heartless things on which we assign much cordiality, and develop a deep relationship of extreme emotions, an aesthetic development of the closeness, a winter dew on the tender surface of rigid mind and what not! Alas! The unfortunate fortune of poor creatures! They have to leave every single thing that was close to their frail bosom. Pity! That is all I can say.

“I” is always loaded with heaviness of being, and giving highest importance makes it heavier. When the passing time tears apart every physical cloths of the importance of “I-ness”, it has nothing but to feel miserable in the illusory world of significance. Therefore, we are left with two major possibilities and one minor alternative; 1) to feel pride and be nostalgic of what you once had and 2) suffer with the reflection of what you had lost. I prefer not to choose any of them but resort to the minor alternative, that is, to be indifferent to either of the possibility. I recall Camus’ famous dictum in The Myth of Sisyphus, “this is a matter of profound indifference”.

The beginning of 2018 brought the ruination of my colossal dream by just a formal email. Email has become a central part of an academic life that can bring a sense of exultation or a sense of gloom, if you look at the world through the two possibilities. If you still prefer to write a lengthy letter to your beloved one’s with the taste of technology, emails can extend its domain to other parts of your life. Therefore, it can bring multiple mental states in your mind, depending upon how you take them. In sort, I have lost my colossal dream, significant persons, new persons that I imagine to be significant, the sense of writing with extreme passion, and in turn, a huge part of I-ness, whatever it is. However, when I claim to be an unemotional person, I intend to mean the management of your mental emotions that cause extreme disturbance. I somehow manage to be indifferent against all of them.

With this short note, adieu 2018. All the significant persons (had been and to be), events, moments, mental senses, and things will be missed with profound indifference.

(Excerpt from the “The diary of a pessimistic person”)pexels-photo-967018.jpeg

अनकहे शब्द

अनकहे शब्दों से पहले,
एक शांत हवा बहती है,
जेहन कपता है,
चीड़ के पेड़ों की तरह,
मनालूस की पहाड़ियों की फिज़ा मे।
ब्यास रोती है,
अपने सूनेपन मे,
अनकहे सूनेपन मे।
कोई तो पत्थर हो,
जो पिघले
कोई तो हवा हो जो बहे,
चुप सी भावनाओ मे,
अनकहे शब्दों में।

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